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महत्वाकांक्षा के घेरे में कैद हुए आजाद कृष्ण मोहन झा/

 कांग्रेस पार्टी को गांधी परिवार के प्रभाव से मुक्त कराने की मंशा से पार्टी के जिन 23 वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को संयुक्त रूप से चिट्ठी लिखकर शीघ्र ही संगठन चुनाव कराने की मांग की थी उन नेताओं की इस 'साहसिक पहल ' ने उन्हें कांग्रेस नेतृत्व का कोप भाजन बनने के लिए मजबूर कर दिया। चिट्ठी पर हस्ताक्षर करने वाले उन 23 नेताओं में केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद भी शामिल थे जिन्हें पार्टी ने राज्य सभा सदस्य के रूप में उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद पुनः राज्य सभा में न भेजने का फैसला किया। गौरतलब है कि आजाद को जिस दिन राज्य सभा से  विदाई दी जा रही थी उस दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  अपने भाषण में उनकी भूरि भूरि प्रशंसा करते हुए अत्यंत भावुक हो गए थे। उस समय राजनीतिक क्षेत्रों में यह अनुमान लगाया गया था कि गुलाम नबी आजाद आगे चलकर भाजपा के पाले में जा सकते हैं परंतु गुलाम नबी आजाद ने उन सभी अनुमानों को झुठलाते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी पार्टी ( भाजपा)  को मजबूती से पकड़े हुए हैं और मैं अपनी पार्टी ( कांग्रेस ) को मजबूती से पकड़ा हूं। आजाद ने उस समय भले ही कांग्रेस के प्रति अपनी अटूट निष्ठा की दुहाई दी थी परन्तु तब भी यह हकीकत तो जगजाहिर हो चुकी थी कि वे कांग्रेस में  घुटन महसूस कर रहे हैं और यह घुटन जब उनकेे लिए असहनीय हो गई तो उन्होंने कांग्रेस के साथ अपना लगभग पांच दशक का नाता तोडने का फ़ैसला कर लिया। कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता आजाद के इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बता रहे हैं तो गांधी परिवार के प्रति निष्ठा वान् कुछ नेताओं की राय में आजाद का यह फैसला उस पार्टी के साथ विश्वासघात है जिसने उन्हें उनके पांच दशक के राजनीतिक जीवन में कद्दावर नेता के रूप में उभरने के भरपूर अवसर प्रदान किए। वहीं पार्टी के आजाद समर्थक वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री आनंद शर्मा का मानना है कि यदि आजाद को पार्टी न छोड़ने के लिए  मनाने के प्रयास किए गए होते तो वे इतना कठोर फैसला लेने के लिए मजबूर नहीं होते। पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि आजाद ने अपने त्यागपत्र के रूप में जो लंबी चिट्ठी लिखी है उसमें उठाए गए मुद्दों पर गौर किया जाना चाहिए । राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट कहते हैं कि जब कांग्रेस पार्टी भाजपा को चुनौती देने के लिए कमर कसकर तैयार हो रही है तब गुलाम नबी आजाद ने अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया। सचिन पायलट ने राहुल गांधी पर व्यक्तिगत आक्षेप करने के लिए भी गुलाम नबी आजाद की आलोचना की है। गौरतलब है कि आजाद ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देते हुए पार्टी अध्यक्ष को पांच पेज की जो चिट्ठी लिखी है उसमें मनमोहन सरकार के कार्यकाल में एक विवादित सरकारी अध्यादेश को राहुल गांधी द्वारा मीडिया के सामने फाड़े जाने को उनकी बचकानी हरकत भी करार दिया है। आजाद ने अपनी चिट्ठी में कांग्रेस नेतृत्व द्वारा वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं को अपमानित करने का भी आरोप लगाया है। इस लंबी चिट्ठी में विशेष रूप से राहुल गांधी को निशाना बनाया गया है । सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा तब दिया जब सोनिया गांधी अपने इलाज के लिए विदेश प्रवास पर हैं और राहुल और प्रियंका भी उनके साथ गए हुए हैं। आजाद के इस्तीफे की चिट्ठी में जो आरोप लगाए हैं उन पर सोनिया गांधी, राहुल और प्रियंका गांधी वाड्रा ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन अनेक कांग्रेस नेताओं ने उनके नेतृत्व में विश्वास व्यक्त किया है। अब यह उत्सुकता का विषय है कि क्या कांग्रेस पार्टी आजाद की चिट्ठी में उठाए गए मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता महसूस करेंगी। इसकी संभावना कम ही है। अधिक संभावना तो इस बात की है कि इस चिट्ठी के बाद सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नेतृत्व में विश्वास व्यक्त करने का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ है उसमें और गति आएगी । राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सहित अनेक वरिष्ठ नेता यह चाहते हैं कि राहुल गांधी को एक बार पुनः  कांग्रेस के पूर्णकालिक अध्यक्ष पद की बागडोर संभालने के लिए आगे आना चाहिए जबकि राहुल गांधी अब यह जिम्मेदारी संभालने से साफ इंकार कर चुके हैं। देखना यह है कि गांधी परिवार के नेतृत्व में ही कांग्रेस के उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएं देखने  वाले पार्टी नेता अध्यक्ष पद संभालने के लिए राहुल गांधी की मान-मनौव्वल करने की पुरजोर कोशिशों में कितने सफल हो पाते हैं लेकिन उसके भी पहले उन्हें पार्टी द्वारा अगले माह प्रारंभ होने जा रही भारत जोड़ो यात्रा को सफल बनाने की चिंता सता रही है। 

         गौरतलब है कि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व से आजाद के असंतुष्ट होने की खबरें काफी दिनों से आ रही थीं परन्तु यह अंदाजा कोई नहीं लगा पाया कि वे पार्टी से इस्तीफा देने की हद तक भी जा सकते हैं यद्यपि कांग्रेस नेतृत्व से उनकी  नाराजी के सबूत उसी समय मिल गए थे जब उन्होंने जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनावों के लिए घोषित  कांग्रेस  की चुनाव प्रचार समिति में शामिल होने से इंकार कर दिया था।  आजाद ने पार्टी छोड़ने के लिए वक्त भी ऐसा चुना जब कांग्रेस पार्टी आगामी 7 सितंबर से शुरू होने वाली भारत जोड़ो यात्रा की तैयारियों में जुटी हुई है और उसमें आजाद को भी कोई बड़ी जिम्मेदारी देने की संभावना व्यक्त की जा रही थी। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि गुलाम नबी आजाद के एकाएक कांग्रेस छोड़ने से पार्टी को गहरा झटका लगा है और अब पार्टी को यह आशंका भी सता रही है कि कांग्रेस के कुछ और प्रभावशाली नेता गुलाब नबी आजाद की राह पकड़ सकते हैं । उधर गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस से रिश्ता तोड़ने के बाद यह घोषणा करने में कोई  विलंब नहीं किया कि वे जम्मू-कश्मीर में सक्रिय अपने राजनीतिक मित्रों को साथ लेकर एक नए  दल का गठन करेंगे । उनकी इस घोषणा से यह भी तय हो गया है कि उनकी पार्टी राज्य में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों में अपने उम्मीदवार खड़े करेगी। गुलाम नबी आजाद की पार्टी जम्मू-कश्मीर में पहले से सक्रिय कांफ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के समान ही एक क्षेत्रीय पार्टी की भूमिका में होगी जिसपर गुलाम नबी आजाद का वर्चस्व होगा। गौरतलब है कि गुलाम नबी आजाद अतीत में कांग्रेस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की गठबन्धन सरकार के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं । जम्मू कश्मीर की राजनीति समीकरणों से वे भली-भांति अवगत हैं। जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस छोड़ने के साथ ही अपनी पार्टी के गठन की घोषणा कर दी उससे यह भी स्पष्ट हो गया है कि वे इतने दिनों से गुपचुप तरीके से अपनी क्षेत्रीय पार्टी के गठन की रूपरेखा तैयार करने में जुटे हुए थे और अपनी योजना पर उनका जम्मू-कश्मीर में सक्रिय अपने राजनीतिक मित्रों से विचार विमर्श चल रहा था । आजाद ने अपनी अलग पार्टी बनाने की घोषणा कर के भले ही उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलों पर पूर्ण विराम लगा दिया है परंतु इतना तो तय है कि  जम्मू कश्मीर विधानसभा के आगामी चुनावों में उनकी पार्टी के उम्मीदवार खड़े होने से कांग्रेस का  नुकसान ही सबसे अधिक होगा और भाजपा को परोक्ष फायदा पहुंचेगा।आजाद ने कहा है कि जब ले इस राज्य सभा में विपक्ष के नेता थे तब वे भाजपा नीत राजग सरकार की मुखर आलोचना करने में कभी पीछे नहीं हटे इसलिए उनका भाजपा के प्रति झुकाव होने के जो आरोप लगाए जा रहे हैं उनमें कोई दम नहीं है परंतु अब सबसे अधिक संभावना इसी बात की है कि जम्मू कश्मीर में उनकी पार्टी का भाजपा के साथ चुनाव पूर्व अथवा चुनाव बाद गठबंधन हो सकता है। यह तो तय माना जा रहा है कि जम्मू कश्मीर में गुलाम नबी आजाद की पार्टी अकेले अपने दम पर सरकार बनाने लायक बहुमत हासिल नहीं कर पाएगी परंतु  अगर भाजपा और आजाद को मिलकर सरकार बनाने की स्थिति में होंगे तो दोनों में से कोई भी पार्टी गठबंधन सरकार बनाने से परहेज़ नहीं करेगी। अगर उनकी पार्टी चंद सीटों पर ही सिमट जाती है तब वे किस पार्टी के साथ जाते हैं यह भविष्य ही बताएगा परंतु अभी जो हालात हैं उसे देखते हुए तो यही माना जा सकता है कि वे पहले भाजपा के साथ दोस्ती करना पसंद करेंगे।


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