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“भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय था आपातकाल”: अ.भा.वि.प. की युवा शक्ति ने निभाई संघर्ष में बड़ी भूमिका डॉ. राकेश मिश्र (पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद महाकौशल)

 कभी-कभी जनता को सत्ता और शासन से प्रताड़ित होना पड़ता है, यह प्रताड़ना ऐसी होती है कि उसे भुलाया नहीं जा सकता है। भारत को सदियों से इस तरह की शासकीय प्रताड़ना देखनी पड़ी है। कभी मुगलों के शासन में, तो कभी अंग्रेजों के शासन में जनता को प्रताड़ित किया गया। लेकिन, सबसे दुखद यह रहा कि स्वतंत्रता के बाद भी जनता को इस तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ी। सत्ता की मदांधता ऐसी थी कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के इतिहास का काला अध्याय लिखा गया। वह अध्याय था आपातकाल का। 

26 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 तक का 21 महीने की अवधि तक भारत में आपातकाल रहा। तत्कालीन राष्ट्रपति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की थी। स्वतंत्र भारत के इतिहास के लिए यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था। आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए तथा नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई। इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया। यहां तक कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस को भी प्रतिबंधित कर दिया गया। बात यूं हीं खत्म नहीं हुई, बड़े पैमाने पर पुरुष नसबंदी अभियान चलाया गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भी इसे 'भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि' कहा था। सरकार के अलोकतांत्रिक गतिविधियों का विरोध करने के लिए राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रतिबन्धित कर दिया गया, क्योंकि माना गया कि यह संगठन विपक्षी नेताओं का करीबी है। इसका बड़ा संगठनात्मक आधार सरकार के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन करने की सम्भावना रखता था। पुलिस इस संगठन पर टूट पड़ी थी। उसके हजारों कार्यकर्ताओं को कैद कर लिया गया और यातनाएं दी गई। आरएसएस ने भी प्रतिबंध को चुनौती दी। लाखों स्वयंसेवकों ने प्रतिबंध के खिलाफ और मौलिक अधिकारों के हनन के खिलाफ शांतिपूर्ण और लोकतान्त्रिक तरीके से आन्दोलन में भाग लिया।

केन्द्रीय सत्ता की तानाशाही ऐसी थी कि सभी विपक्षी दलों के नेताओं और सरकार के अन्य स्पष्ट आलोचकों के गिरफ्तार किये जाने और सलाखों के पीछे भेज दिये जाने के बाद पूरा भारत सदमे की स्थिति में आ गया था। लोकनायक जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी समेत विपक्ष के तमाम नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। आपातकाल की घोषणा के कुछ ही समय बाद पंजाब में सिख नेतृत्व ने भी अमृतसर में बैठकों का आयोजन किया, जहां उन्होंने "कांग्रेस की फासीवादी प्रवृत्ति" का विरोध करने का संकल्प किया। देश में पहले जनविरोध का आयोजन अकाली दल ने किया था, जिसे "लोकतंत्र की रक्षा का अभियान" के रूप में जाना जाता है। इसे 9 जुलाई को अमृतसर में शुरू किया गया था। इस तरह देश के सभी राज्यों में केंद्र सरकार की तानाशाही के खिलाफ आंदोलन मुखर होता गया। राज्य की विधान सभाओं से विपक्षी विधायकों ने इस्तीफा देना शुरू किया। 

वर्ष 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। उनके प्रतिद्वंद्वी राजनारायण द्वारा इस चुनौती के बाद से देश में राजनीतिक उथल-पुथल का दौर शुरू हुआ। राजनारायण के वकील थे, प्रसिद्ध अधिवक्ता शांतिभूषण। हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका में राजनारायण ने इंदिरा गांधी पर सरकारी मशीनरी और संसाधनों के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। यह मामला राजनारायण बनाम उत्तर प्रदेश नाम से जाना जाता है। उस समय इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने अपने फैसले में माना कि इंदिरा गांधी ने सरकारी मशीनरी और संसाधनों का दुरुपयोग किया। इसलिए जनप्रतिनिधित्व कानून के अनुसार उनका सांसद चुना जाना अवैध है।

अदालत ने साथ ही अगले 6 साल तक उनके कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। ऐसी स्थिति में इंदिरा गांधी के पास राज्यसभा में जाने का रास्ता भी नहीं बचा था। अब उनके पास प्रधानमंत्री पद छोड़ने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। हालांकि अदालत ने कांग्रेस पार्टी को थोड़ी राहत देते हुए ‘नई व्यवस्था अर्थात नया प्रधानमन्त्री’ बनाने के लिए तीन हफ्तों का वक्त दे दिया था। इस समय देश में ‘इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया’ का माहौल बना दिया गया था। ऐसे माहौल में इंदिरा के होते किसी और को प्रधानमंत्री कैसे बनाया जा सकता था?  साथ ही इंदिरा अपनी पूरी पार्टी में किसी पर भी विश्वास नहीं करती थीं।

कुछ ख़ास सिपहसलारों ने इंदिरा गांधी को समझाया कि यदि उन्होंने प्रधानमंत्री का पद किसी और को दिया तो फिर वह व्यक्ति इसे नहीं छोड़ेगा और आपके द्वारा पार्टी में बनायीं गयी पकड़ ख़त्म हो जाएगी। इंदिरा गांधी इन तर्कों से सहमत हो गई और उन्होंने तय किया कि वे इस्तीफा देने के बजाय 3 हफ़्तों की मिली मोहलत का फायदा उठाते हुए इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगी।

इस केस की सुनवाई जज जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर ने की थी। जज ने अपने फैसले में कहा कि वे इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर पूर्ण रोक नहीं लगाएंगे। कोर्ट की उठापटक के बीच बिहार, गुजरात में कांग्रेस के खिलाफ छात्रों का आन्दोलन भी उग्र हो रहा था। बिहार में इस आन्दोलन का नेतृत्व लोकनायक जयप्रकाश नारायण कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अगले दिन यानी 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण की रैली थी। जयप्रकाश ने इंदिरा गांधी के ऊपर देश में लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगाया और रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता के अंश "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है" का नारा बुलंद किया था। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने विद्यार्थियों, सैनिकों और पुलिस वालों से अपील कि वे लोग इस दमनकारी निरंकुश सरकार के आदेशों को ना मानें, क्योंकि कोर्ट ने इंदिरा को प्रधानमन्त्री पद से हटने को बोल दिया है। महज इसी रैली के आधार पर इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाने का फैसला किया था। इसके अलावा इन कारणों ने भी इंदिरा गांधी को आपातकाल के लिए मजबूर किया था। इंदिरा गांधी के खिलाफ पूरे देश में जन आक्रोश बढ़ रहा था। अगली कतार में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् था। उसका देशव्यापी संगठन था। उसके कार्यकर्ता तमाम विश्वविद्यालयों के छात्र संघों का नेतृत्व कर रहे थे। उसकी इस संगठन शक्ति का दूसरे जमात वाले लोहा भी मानते थे। पर यहाँ यह जरूर जोड़ा जाना चाहिए कि वह आंदोलन सामूहिकता की शक्ति लिए हुए था। इसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की अगुवाई में अन्य छात्र और सम्पूर्ण विपक्ष एकजुट हो गए थे। कोर्ट के आदेश ने इंदिरा गांधी की हालात को पंगु बना दिया था, क्योंकि इंदिरा गांधी अब संसद में वोट नहीं डाल सकती थीं और उनको पार्टी के किसी नेता पर भरोसा भी नहीं था।

इसके अलावा इंदिरा गांधी को लगा कि जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर सेना तख्ता पलट कर सकती है। इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने का सबसे बड़ा बहाना जयप्रकाश नारायण द्वारा बुलाया गया असहयोग आन्दोलन था। इसी आधार पर इंदिरा गांधी ने 26 जून, 1975 की सुबह राष्ट्र के नाम अपने संदेश में कहा कि जिस तरह का माहौल (सेना, पुलिस और अधिकारियों को भड़काना) देश में एक व्यक्ति अर्थात जयप्रकाश नारायण के द्वारा बनाया गया है उसमें यह जरूरी हो गया है कि देश में आपातकाल लगाया जाए। 

इस तरह इंदिरा गांधी द्वारा देश में लगाया गया आपातकाल भारत के राजनीतिक इतिहास का एक काला अध्याय बन गया है। जिन लोगों ने उस समय को देखा वे आज भी उन दिनों को याद कर कांप जाते हैं।  जेल में कैद के दौरान भारत रत्न अटलबिहारी वाजपेयी की कविताओं में उस समय की स्थिति का आकलन है :-

अनुशासन के नाम पर, अनुशासन का खून

भंग कर दिया संघ को, कैसा चढ़ा जुनून

कैसा चढ़ा जुनून, मातृपूजा प्रतिबंधित

कुलटा करती केशव-कुल की कीर्ति कलंकित

यह कैदी कविराय तोड़ कानूनी कारा

गूंजेगा भारतमाता-की जय का नारा। 

कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने जब इंदिरा गांधी को भारत माता के तुल्यं दर्शाने का दुस्साेहस किया, तब अटल जी चुप न बैठ सके। उन्होंने करारा व्यं्ग्यश करते हुए ये उद्गार व्त्ैद    किए-

'इंदिरा इंडिया एक है, इति बरूआ महाराज,

अकल घास चरने गई चमचों के सरताज,

चमचों के सरताज, किया अपमानित भारत,

एक मृत्यु के लिए कलंकित भूत भविष्यत्,

कह कैदी कविराय स्वलर्ग से जो महान है,

कौन भला उस भारत माता के समान है?

अटल जी को भरोसा था कि जनता इस तानाशाही को और अधिक बर्दाश्त नहीं करेगी। तभी तो उनका कवि हृदय आश्वस्त होकर यह बोला था – 


दिल्ली के दरबार में कौरव का है जोर,

लोकतंत्र की द्रौपदी रोती नयन निचोर,

रोती नयन निचोर नहीं कोई रखवाला,

नए भीष्म द्रोणों ने मुख पर ताला डाला,

कह कैदी कविराय बजेगी रण की भेरी,

कोटि-कोटि जनता न रहेगी बनकर चेरी।


दूसरी बात वामपंथियों ने इंदिरा जी का साथ देकर अपनी कीमत ली थी। भारत के सविंधान की मूल आत्मा को ही विकृत कर दिया गया। आज की युवा पीढ़ी को यह जानना बहुत जरूरी है कि धर्मनिरपेक्ष (सेकुलर) और समाजवाद (सोशलिस्ट) इन दोनों शब्दों पर संविधान निर्माण समिति में बहुत व्यापक चर्चा हुई थी, और यह निर्णय हुआ था कि इन दोनों शब्दों को भारत के स्वरूप में हम नहीं लिखेंगे। लेकिन आपातकाल के उस अलोकतांत्रिक माहौल में इन दोनों शब्दों को एक तानाशाही के रास्ते पर चलने वाली सरकार ने तुष्टिकरण की राजनीति के चलते संविधान की प्रस्तावना में डाल दिया था, जो आज भी राष्ट्र वाद में बड़ा धब्बात है। 



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