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लक्ष्मण चरित्र पर राम कथा का चौथा दिन लक्ष्मण जी तेजतर्रार नहीं सबसे बड़े ब्रह्मचारी और त्यागी हैं : संत श्री मैथिलीशरण

 छतरपुर, श्री रामचरितमानस में लक्ष्मण जी महाराज के चरित्र की व्याख्या करते हुए संत श्री मैथिलीशरण भाई जी ने कहा कि दूसरों में दोष देखना संसार विषयक है पर दूसरे से गलती हो गई यह विचार भगवान से जोड़ता है, दूसरों में दोष देखकर व्यक्ति न जाने कितनी योजनाएं बनाता है जबकि उसे 1 दिन का भी पता नहीं है यदि आपने दोष देखकर किसी को मानसिक और व्यवहारिक रूप से त्याग दिया है तो कभी विचार कीजिए आपको खुद एहसास होगा कि हमसे गलती हो गई है, लक्ष्मण जी महाराज किसी में कोई  दोष नहीं देखते, उन्होंने माता केकई और पिता दशरथ के विरुद्ध एक वाक्य भी नहीं बोला है लक्ष्मण जी तेजतर्रार नहीं अपितु सबसे बड़े ब्रह्मचारी और त्यागी है उनकी निष्ठा और आधार तो भगवान श्रीराम है जो वनवास मिल जाने पर भी माता कौशल्या से कहते हैं कि पिताजी ने मुझे अयोध्या का युवराज बनाने के स्थान पर वन का राजा बना दिया है जहां मेरा सब प्रकार से हित है

पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू।
जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू।।
संत श्री मैथिली शरण जी ने कहा कि लक्ष्मण जी के वाणी का संयम और समर्पण की भावना जनकपुर की पुष्प वाटिका में देखने को मिलती है जहां सीता जी को देखने के बाद भगवान राम अपनी बात रखते हैं पर लक्ष्मण जी एक शब्द भी नहीं बोलते है, काम क्रोध लोभ तमोगुण सारी सृष्टि की रचना भगवान ने की है पर इन्हें बुरा कह कर आपको पिंजड़े में फंसाया जा रहा है, उन्होंने कहा कि जितना विश्वास आपको ग्रहों पर है इतना विश्वास भगवान पर हो जाए तो जीवन धन्य हो जाएगा, मैं शरीर हूं इस अहम से ऊपर उठ जाना और मूल तत्व से जुड़ जाना लक्ष्मण जी महाराज से सीखा जा सकता है
छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।
करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु॥
सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि।
जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि॥
भाई जी ने कहा जिस प्रकार हम अपने शरीर की सेवा करते हैं लक्ष्मण जी महाराज उसी तरह भगवान राम की सेवा कर रहे हैं उन्हें यह पता ही नहीं है कि वह कहां है आनंद की पराकाष्ठा में समय विषयक विस्मृति हो जाती है
हम श्रम कर सकते हैं परिणाम तो ईश्वर के हाथ में
उन्होंने कहा कि व्यक्ति श्रम कर सकता है परिणाम ईश्वर के हाथ में ही होता है कोई व्यक्ति पानी के लिए कुआं कितना भी गहरा खोदे पर उसमें पानी निकलना ईश्वर की कृपा से ही संभव है मैथिली शरण जी ने कहा कि वैज्ञानिक भी अनावरण कर रहे हैं, सृजन तो भगवान करता है, उन्होंने कहा कि गुणों का संचालन ठीक-ठाक न किया जाए तो वह अवगुण बन जाता है खिड़की हवा लेने के लिए है पर जब आंधी आती है तो खिड़की भी बंद करना पड़ती है, रावण ने भले ही सोने की लंका बनाई हो पर भगवान ने उसे विभीषण को दे दिया, मैथिली शरण जी ने कहा कि भगवान ने आपको सबसे अनमोल वस्तु वाणी दी है जिस का सदुपयोग कीजिए, बुढ़ापा आते-आते तक सुनाई और दिखाई देना कम हो जाता है पर वाणी यथावत बनी रहती है, भाई जी ने कहा कि सत्संग घाटे का नहीं परम लाभ का सौदा है जिसके पास कोई बैठना ना चाहे ऐसा जीवन किस काम का है जनता केवल सफलता की पुजारी है, इससे भी हमें सावधान रहना होगा



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