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कोरोना काल में भी प्रासंगिक है दीनदयाल जी का एकात्म मानव दर्शन कृष्णमोहन झा/

 स्वर्गीय पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने 1964 में एकात्म मानववाद की अवधारणा तात्कालीन भारतीय जनसंघ के अधिवेशन में प्रस्तुत की थी। उनकी इस अवधारणा को भारतीय जनसंघ के अगले अधिवेशन में स्वीकार कर लिया गया, तब देश में ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय  स्तर पर भी यह एकात्म मानववाद चर्चा का विषय बन गया। उस समय प्रचलित पूंजीवाद और साम्यवाद की विफलताओं ने स्वाभाविक रूप से एकात्म मानववाद के प्रति उत्सुकता जागृत कर दी थी ।  दीनदयाल जी को जब 1967 के अंत में कालीकट में आयोजित भारतीय जनसंघ के अधिवेशन में पार्टी का अध्यक्ष चुना गया था , तब एकात्म मानववाद की स्वीकार्यता तथा उसके प्रचार- प्रसार को व्यापक स्तर पर किए जाने के लिए आवश्यक वातावरण के निर्माण की संभावनाएं भी बलवती प्रतीत होने लगी। दुर्भाग्य से तीन माह बाद ही दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु ने उस विराट व्यक्तित्व की जीवन यात्रा पर समय पूर्व ही विराम लगा दिया।


एक प्रखर पत्रकार, दार्शनिक, विचारक, अद्भुत संगठक ,संवेदनशील राजनेता, गहन चिंतक जैसे ना जाने कितने व्यक्तित्व का समग्र रूप था, स्वर्गीय दीनदयाल उपाध्याय के विराट व्यक्तित्व में।  उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि अगर भारत के पास दो दीनदयाल होते तो इस देश का राजनीतिक परिदृश्य ही अलग होता।  तात्कालिक भारतीय जन संघ के वरिष्ठ नेता स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी  ने उन्हें ज्ञान का सूर्य निरूपित करते हुए कहा कि अब हमारे पास उस सूर्य का प्रकाश नहीं है। हमें तारों की रोशनी में ही अपनी राह बनानी होगी।  अटल जी के मार्मिक कथन से यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि स्वर्गीय दीनदयाल उपाध्याय अपने आप में एक संस्था थे ,जो संपूर्ण मानव जाति के उत्थान और कल्याण का मार्ग दिखाने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए थे। वे मातृ आधी शताब्दी की अपनी जीवन यात्रा में एकात्म मानव दर्शन के रूप में ऐसा प्रकाश पुंज बिखेर कर चले गए, जिसका आलोक हर मानव के चेहरे पर खुशहाली और संतुष्टि का भाव लाने में समर्थ है।  दीनदयाल जी ने जिस एकात्म मानववाद की अनूठी अवधारणा का अनमोल उपहार इस देश को लगभग आधी शताब्दी पूर्व दिया था ,उसकी उपादेयता और प्रासंगिकता सर्वकालिक है। आज जब सारी दुनिया एक गांव का रूप ले चुकी है, तब एकात्म मानववाद की उपादेयता और भी बढ़ गई है।


पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के दायरे को केवल एक देश की भौगोलिक सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। वे एकात्मता के इस भाव को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखने के पक्षधर थे।  स्वर्गीय दीनदयाल जी के द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानववाद में व्यक्ति की परिवार के साथ एकात्मता, परिवार की समाज के साथ ,समाज की राष्ट्र के साथ और राष्ट्र की विश्व के साथ एकात्मता स्थापित करने की जो अवधारणा है, वही किसी भी देश की प्रगति, विकास और शांति का आधार है। मनुष्य को समाज से पृथक कर और समाज को मनुष्य से अलग करके देखना संभव नहीं है।  वे भौतिक बनाम आध्यात्मिक नहीं बल्कि भौतिक और आध्यात्मिक को एकात्म रूप में देखने पर जोर देते थे।  उपाध्याय जी मानव और प्रकृति के बीच भी एकात्मता के पक्षधर थे। उनका मानना था कि प्रकृति और मानव एक दूसरे से ऐसे जुड़े हुए हैं कि उन्हें अलग-अलग देखा ही नहीं जा सकता। एकात्म मानववाद के प्रणेता उपाध्याय जी एकात्मकता को ही जनकल्याण, शांति और विकास का स्रोत मानते थे।  संरक्षणवाद के विपरीत एकात्म मानववाद की अवधारणा प्रस्तुत कर उन्होंने यही संदेश दिया था कि संरक्षणवाद की हर तरह इसमें छोटे बड़े के बीच कोई भेद नहीं है।  एकात्म मानववाद में समाज का हर अंग महत्वपूर्ण है। एकात्म मानववाद में यह संदेश भी छिपा हुआ है कि जब किसी व्यक्ति के हित में कोई कार्य किया जाता है तो पूरे परिवार समाज और राष्ट्र का हित भी उसमें निहित होता है क्योंकि एकात्म मानववाद में व्यक्ति समाज और राष्ट्र में एकात्मकता की बात कही गई है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद की विचारधारा जब प्रस्तुत की थी ,तब से अब तक आधी शताब्दी से भी अधिक का समय बीत चुका है परंतु समय की कसौटी पर यह अवधारणा निरंतर खरी सिद्ध होती रही है।  इसकी उपादेयता जितनी इसके प्रस्तुतीकरण के समय थी ,उतनी ही आज भी है बल्कि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि एकात्म मानववाद वर्तमान समय में कही अधिक प्रासंगिक सिद्ध हो रहा है।


पूंजीवाद और साम्यवादी जैसी विचारधाराएं इतिहास की विषय वस्तु बनकर रह गई है, परंतु पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानववाद अपनी विलक्षण विशेषताओं के कारण हमेशा जीवंत बना रहेगा।  गौरतलब है कि जिस समय दीनदयाल उपाध्याय अपना एकात्म मानववाद लेकर आए थे,  वह समय विश्व की महाशक्तियों के बीच शीत युद्ध का दौर था और पूंजीवाद और साम्यवाद आंदोलन दम तोड़ने में लगे थे।  इसलिए दीनदयाल उपाध्याय ने एक ऐसी अवधारणा विकसित किए जाने  की आवश्यकता महसूस की जिसमें स्पर्धा नहीं एकात्मकता को  प्रमुखता दी गई हो।  इसमें परस्पर विरोध के लिए कोई जगह ना हो ,बल्कि उसके स्थान पर सामंजस्य को तरजीह दी गई है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय उस अवधारणा के प्रणेता बने , जिसमें मानव जाति के शांति, सहयोग और विकास की सम्भावनाओ को प्रबल बनाने का सामर्थ्य हो।


स्व. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन में जाति, धर्म, समुदाय, रंग के आधार  पर विभेद की कोई जगह नहीं है। इसमें जब सभी के बीच में एकात्मता के भाव को प्रमुखता दी गई हो तो भेदभाव का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। एक की पीड़ा सबकी पीड़ा और एक की प्रगति सबकी प्रगति तभी बन सकती है, जब व्यक्ति की समाज के साथ, समाज की राष्ट्र के साथ और राष्ट्र की संपूर्ण विश्व के साथ एकात्मता सुनिश्चित करने वाला यह एकात्म मानव दर्शन किसी को विशेष महत्व देने और किसी की उपेक्षा कर देने की अनुमति नहीं देता । एक के लिए सब और सबके लिए एक इसका मूल तत्व है। दोनो परस्पर जुड़े हुए ही नहीं है ,बल्कि दोनों एक है, क्योंकि  उन्हे एकात्मकता के दर्शन ने जोड दिया है। पं दीन दयाल उपाध्याय का सानिध्य इस देश को लंबे समय तक प्राप्त होता तो वे एकात्म मानव दर्शन का और वृहद रूप् लेकर सामने आते, लेकिन एकात्म मानव दर्शन उसी रूप् में इतना समृद्ध है कि वह हमारे लिए शांति, सहयोग और प्रगति के सारे द्वार खोल देता है। अब आवश्यकता इस बात की है कि हम इस अनूठी परिकल्पना को मूर्त रूप प्रदान करने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ते रहें।

 

आज जब लगभग सारा देश कोरोना वायरस के संक्रमण की चपेट में है और इसकी भयावहता भी निरंतर बढ़ती जा रही है, तब पं. दीनदयाल  उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानव दर्शन की प्रासंगितकता और उपादेयता भी सवाल उठना स्वाभाविक है। चूँकि इस दर्शन में मानव से लेकर विश्व तक की एकात्मता की बात कही गई है। इसलिए एकात्म मानव दर्शन कोरोना संकट से निपटने के प्रयासों में भी एकात्मता की अपरिहार्यता सिद्ध करता है। कोरोना संकट पर विजय पाने के लिए दुनिया के अलग-अलग देशों में अलग-अलग प्रयास किए जा रहे है, परंतु सबका अंतिम लक्ष्य एक ही है, कोरोना पर विजय पाना। एक देश द्वारा किए जाने वाले शोध अगर सफल होते है तो उनकी उपयोगिता संपूर्ण विश्व के लिए निर्विवाद मानी जाएगी। यह संकट किसी एक देश की भौगोलिक सीमाओं तक ही सीमित नहीं है ,उसी प्रकार एकात्म मानववाद को भी भोगोलिक दायरे में नही बांधा जा सकता । एक देश में विकसित वैक्सीन का लाभ संपूर्ण विश्व तक पहुंचना चाहिए क्योंकि सारी मानव जाति में एकात्मकता है, उसमें रंगभेद जाति, वर्ण अथवा देश आधार पर कोई भेदभाव करने की अनुमति एकात्म मानव दर्शन नहीं देता। उदाहरण के लिए प्लाज्मा थैरेपी की उपयोगिता पर विचार करे तो इसकी शुरूआत एक कोरोना संक्रमित मरीज से होती है, फिर उसके बाद कई संक्रमितों तक इसका लाभ पहुंचता है, क्योंकि व्यक्ति से परिवार और परिवार से एकात्म समाज बनता है। एकात्मकता का यह भाव ही संवेदना को जन्म देता है।


 कोरोना काल में एकात्म मानव दर्शन की प्रासंगिकता उभर कर सामने आई है। स्व पं दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानव दर्शन का जब प्रतिपादन किया था , तब उन्होने स्वदेशी और अंत्योदय की अवधारणा प्रस्तुत की थी। उनका कहना था कि स्वदेशी से स्वावलंबन आता है और स्वावलंबन से स्वाभिमान का भाव जागृत होता है। वे यह भी कहते थे कि उत्पादन के साधनों का विकेन्द्रीकरण होना चाहिए।  सब पर सबका समान अधिकार होना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डाॅ मोहन भागवत ने लाकडाॅउन के दौरान अपने एक संदेश में स्वदेशी और स्वाबलंबन की अवधारणा पर बल देते हुए कहा था कि कोरोना का संकट स्वावलंबन का संदेश लेकर आया है। हमे आपदा को अवसर में बदलने के लिए पूरे बल के साथ जुट जाना चाहिए। भागवत का मत है कि स्व आधारित तंत्र के  स्वावलंबन में हमे अपनी अर्थ नीति ,विकास नीति और यांत्रिकी परंपरा के अनुकूल रचना करनी पडेगी। आधुनिक विकास और परंपरा के बीच समन्वय स्थापित करते हुए विकास का एक मॉडल का निर्माण करना होगा। भागवत कहते है कि समाज को भी इसमें सहयोग करना होगा, केवल सरकार पर निर्भर रहने से हमारे उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती। स्वावलंबन अर्जित करने के लिए हमें स्वदेश में ही निर्मित वस्तुओं के उपयोग का संकल्प लेना होगा और यह भी तय करना होगा कि जिन आयातित वस्तुओं के उपयोग के बिना हम अपना काम चला सकते हैं ,उनका उपयोग हम नहीं करेंगे।  संघ प्रमुख ने कहा था कि हमें अपने व्यक्तिगत और परिवार के व्यवहार में स्वदेशी का आचरण करना होगा।  भागवत ने अपने इस संदेश में वस्तुतः दीनदयाल जी की स्वदेशी की अवधारणा को ही मूर्त रूप प्रदान करने की अपील की थी। 


पंडित दीनदयाल उपाध्याय का व्यक्तित्व जितना विराट था ,उतना ही वे दूरदर्शी राजनेता भी थे, उन्होंने पांच दशक पहले ही इस देश के लिए आत्मनिर्भरता की अपरिहार्यता की परिकल्पना कर ली थी। लॉकडाउन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब अपने एक संदेश में आत्मनिर्भर भारत अभियान का आव्हान  किया तो वह दीनदयाल के उपाध्याय के स्वदेशी और स्वावलंबन की अवधारणा में अटूट आस्था और विश्वास की अभिव्यक्ति ही थी। प्रधानमंत्री मोदी ने आत्मनिर्भर भारत अभियान को सफल बनाने के लिए 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा के द्वारा यह साबित कर दिया कि दीनदयाल जी ने स्वदेशी और स्वावलंबन का जो सपना पांच दशक पूर्व संजोया था, उसे साकार प्रदान करने की पर्याप्त इच्छाशक्ति वर्तमान सरकार में मौजूद है। प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से अपने संबोधन में भी इसका विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा था कि भारत अब आत्मनिर्भरता के रास्ते पर तेजी से बढ़ने का संकल्प ले चुका है। हम केवल स्वदेशी का उपयोग ही नहीं करेंगे ,बल्कि दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे।  इसके लिए प्रधानमंत्री ने लोकल के लिए वोकल का नारा भी दिया है । 


पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्म शताब्दी पर आयोजित कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री ने कहा था कि उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व हमारे लिए प्रेरणा का विषय है और उनकी अंत्योदय की अवधारणा के प्रति सम्मान स्वरूप ऐसी अनेक योजनाएं प्रारंभ की जा रही है, जो समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की खुशहाली सुनिश्चित करेगी। पूर्ववती भारतीय जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन के प्रचार प्रसार एवं उसमें आमजन की भागीदारी सुनिश्चितय करने हेतु सरकार द्वारा अनेक योजनाएं प्रारंभ की गई है। दीनदयाल जी के एकात्म मानव दर्शन पर अभी बहुत शोध की आवश्यकता है। यह दर्शन सनातन सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित है  और समय के साथ इसकी उपादेयता भी निर्विवाद सिद्ध होगी।

(लेखक भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय संयोजक है)


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