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प्रसंगवश : अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (21 फरवरी) मातृभाषा से ही मिलती है सामाजिक पहचान हमारी मौलिक विशेषता होती है मातृभाषा

 मानव के विकास में भाषा की अहम भूमिका होती है, जीवन में आगे बढ़ने के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है और ज्ञान की प्राप्ति के लिए भाषा अहम है। इसमें मातृभाषा के अपने अलग मायने होते हैं। जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है, वह उसकी मातृभाषा होती है। मातृभाषा ही किसी भी व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषाई पहचान होती है। जन्म से हम जो भाषा का प्रयोग करते है, वही हमारी मातृभाषा है। सभी संस्कार एवं व्यवहार इसीके द्वारा हम पाते है। इसी भाषा से हम अपनी संस्कति के साथ जुड़कर उसकी धरोहर को आगे बढ़ाते है। मातृभाषा का जो वैश्विक भाव है, उसके तहत मातृभाषा का रिश्ता जन्मदायिनी माता के साथ जुड़ा हुआ है। मातृभाषा में मातृशब्द से अभिप्राय उस परिवेश, स्थान, समूह में बोली जाने वाली भाषा से भी है, जिसमें रहकर कोई भी व्यक्ति अपने बाल्यकाल में दुनिया के सम्पर्क में आता है। महान साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र ने मातृभाषा का महत्व बताया है:

“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल।।”

भारत में विभिन्न क्षेत्रों में रहनेवाले लोगों की अपनी-अपनी मातृभाषा है। हर प्रांत की अलग संस्कृति है, एक अलग पहचान है। उनका अपना एक विशिष्ट भोजन, संगीत और लोकगीत हैं। इस विशिष्टता को बनाये रखना, इसे प्रोत्साहित करना अति आवश्यक है। दुर्भाग्यवश आज बच्चे अपनी मातृभाषा को भूल रहे हैं, लेकिन आवश्यकता है कि वे अपनी मातृभाषा सीखें, प्रयोग करें और इस धरोहर को संभाल कर रखें। आप जितनी अधिक भाषाएँ जानेगें, सीखेंगे वह आपके लिए ही उत्तम होगा। आप जिस किसी भी प्रांत, राज्य से हैं कम से कम आपको वहां की बोली तो अवश्य आनी चाहिए। आपको वहां की बोली सीखने का कोई भी मौका नहीं गवांना चाहिए। हमारी मातृभाषा में कितने अच्छे और गूढ़ अर्थ के लोकगीत, बाल कविताएँ, दोहे, छंद चौपाइयाँ हैं, जिन्हें हम प्रायः भूलते जा रहे हैं। भारत के हर प्रांत में सुन्दर दोहावली उपलब्ध है और यही बात विश्व भर के लिए भी सत्य है। उदाहरण के लिए एक जर्मन बच्चा अपनी मातृभाषा जर्मन में ही गणित सीखता है न कि अंग्रेजी में क्योंकि जर्मन उसकी मातृभाषा है। इसी प्रकार एक इटली में रहने वाला बच्चा भी गिनती इटैलियन भाषा में और स्पेन का बालक स्पैनिश भाषा में सीखता है। 

हिंदी इस देश की राजभाषा और विशाल भूभाग के लिए यह मातृभाषा भी है, परन्तु आज यह भाषा  अपनी ही बुनियाद की रक्षा में लगी है। ये वही भाषा है, जिसने इस सोते हुए राष्ट्र को दासता की नींद से जगाया। इसी भाषा ने भारत को स्वतंत्रता का अर्थ समझाया। यही वह भाषा है जो स्वतंत्रता संग्राम की साक्षी बनी। महात्मा गाँधी के अविस्मरणीय विचारों की माध्यम बनकर इसी भाषा ने देश में परिवर्तन की नींव रखी। यही वो भाषा है, जिसने विभिन्न जाति-धर्म-समुदायों में बिखरे इस देश में प्रथम बार राष्ट्रवाद की स्थापना की।  

शिक्षा के माध्यम के सन्दर्भ में गांधी जी के विचार स्पष्ट थे। उनका मानना था कि भारत में 90 प्रतिशत व्यक्ति चौदह वर्ष की आयु तक ही पढ़ते हैं, अत: मातृभाषा में ही अधिक से अधिक ज्ञान होना चाहिए। उन्होंने 1909 ई. में "स्वराज्य" में अपने विचार प्रकट किए हैं। उनके अनुसार हजारों व्यक्तियों को अंग्रेजी सिखलाना, उन्हें गुलाम बनाना है। गांधी जी विदेशी माध्यम के कटु विरोधी थे। उनका मानना था कि विदेशी माध्यम बच्चों पर अनावश्यक दबाव डालने, रटने और नकल करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता है तथा उनमें मौलिकता का अभाव पैदा करता है। यह देश के बच्चों को अपने ही घर में विदेशी बना देता है। गांधी जी के अनुसार विदेशी माध्यम का रोग बिना किसी देरी के तुरन्त रोक देना चाहिए। उनका मत था कि मातृभाषा का स्थान कोई दूसरी भाषा नहीं ले सकती। उनके अनुसार, "गाय का दूध भी मां का दूध नहीं हो सकता।"

लोकभाषा, मातृभाषा में बच्चों का बात ना करना अब एक फैशन हो गया है। इससे गाँव और शहर के बच्चों में दूरियां बढ़ती हैं। गाँव, देहात के बच्चे जो सबकुछ अपनी लोकभाषा में सीखते हैं अपने को हीन और शहर के बच्चे जो सबकुछ अंग्रेजी में सीखते हैं, स्वयं को श्रेष्ठ, बेहतर समझने लगते हैं। इस दृष्टिकोण में बदलाव आना चाहिए। हमारे बच्चों को अपनी मातृभाषा और उसी में ही दार्शनिक भावों से ओतप्रोत लोकगीत का आदर करते हुए सीखने चाहिए। नहीं तो हम अवश्य ही कुछ महत्वपूर्ण खो देंगे। बांग्ला भाषा में बेहद सुन्दर लोकगीत हैं जो वहां के लोकगायक बाउल नामक वाद्ययंत्र पर गाते बजाते हैं। इसी प्रकार आँध्र प्रदेश में जनपद साहित्य  और वहां के लोकगीत, छत्तीसगढ़ के लोकनृत्य, केरल के सुन्दर संगीत, भोजन, संस्कृति सब कुछ अप्रतिम है। 

यूनेस्को के मुताबिक दुनिया भर में 6000 भाषाएं बोली जाती हैं। भारत की बात करें तो, साल 1961 की जनगणना के मुताबिक यहां 1652 भाषाएं बोली जाती हैं। भारत में 29 भाषाएं ऐसी हैं उनको बोलने वालों की संख्या 10 लाख से ज्यादा है। भारत में 7 भाषाएं ऐसी बोली जाती है, जिनको बोलने वालों की संख्या एक लाख से ज्यादा है। भारत में 122 ऐसी भाषाएं हैं, जिनको बोलने वालों की संख्या 10 हज़ार से ज्यादा है। यूनेस्को वर्ष 1999 में 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा की।

भारत में नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में चलनेवाली सरकार हमेशा भारतीय भाषाओं को सशक्त बनाने में लगी रही है। तभी तो केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की घोषणा 21वीं सदी की ज्ञान संबंधी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, भारत को एक सशक्त ज्ञान आधारित राष्ट्र बनाने तथा इसे वैश्विक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक एवं क्रांतिकारी क़दम है। भारत में शिक्षा नीति की आवश्यकता थी, जिस शिक्षा को ग्रहण करने के बाद शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक रूप से विकसित ऐसे कौशलयुक्त युवाओं का सृजन हो सके, जिसमें गौरवशाली भारतीय संस्कृति की जीवंतता, भारतीय भाषाओं में प्रवीणता तथा भारतीय दृष्टि के अनुरूप ज्ञान-विज्ञान में दक्षता स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो।

इस शिक्षा नीति में भाषा के सामर्थ्य को स्पष्ट रूप से इंगित करते हुए कम से कम कक्षा पाँच तक मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने पर विशेष बल दिया गया है। कक्षा आठ और उसके आगे भी भारतीय भाषाओं में अध्ययन का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही विद्यालयीय एवं उच्च शिक्षा में त्रिभाषा फ़ार्मूले के अंतर्गत देवभाषा संस्कृत तथा भारत की अन्य पारंपरिक भाषाओं में से विकल्प चुनने का प्रावधान है। बाल्यावस्था में मानसिक विकास की गति तीव्र होती है तथा इस अवस्था में मातृभाषा में अध्ययन से बच्चे के अंदर चिंतन, स्मरण, निर्णय लेने की क्षमता जैसी वृत्तियों का सहज विकास होता है। मातृभाषा में अध्ययन से अपनी भाषा के प्रति ममत्व और आत्मीयता का भाव तो जगेगा ही, साथ ही साथ छात्र आगे चलकर अपनी मातृभाषा में पारंगत होंगे तथा भारतीय संस्कृति के भी सशक्त वाहक होंगे।

मौलिक चिंतन किसी और भाषा में नहीं, बल्कि अपनी मातृभाषा या स्थानीय भाषा में ही संभव है। मातृभाषा में लिया हुआ ज्ञान संपूर्णता के साथ छात्र के मस्तिष्क में शत-प्रतिशत स्वीकार्य होता है तथा इस ज्ञान की छाप अमिट होती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय भाषाओं को सही अर्थों में प्रतिस्थापित करने की दिशा में विद्यालयों और उच्च शिक्षा में बहु-भाषावाद को बढ़ावा देगी तथा इससे विद्यालयों में मातृभाषा या स्थानीय भाषा में पठन-पाठन सुनिश्चित हो सकेगा।


आज आम छात्रों में भारतीय भाषाओं को लिखने और बोलने में प्रवीण होने की आवश्यकता है। विश्व के विकसित देश अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, इज़राइल, फ़्रान्स आदि की अपनी एक भाषा है जो उनकी बोलचाल तथा गणित, विज्ञान सहित व्यवसाय की भी भाषा है। इन देशों में इनकी अपनी भाषा में ही पठन-पाठन की बाध्यता है।

हमें भारत की गौरवमयी ज्ञान-विज्ञान की परंपरा का स्मरण करते हुए समझना होगा कि भारतीय भाषाएँ भारत की अस्मिता की पहचान हैं, जो विविधता में एकता का दर्शन कराती हैं। भारतीय भाषाएँ देश की प्रशासनिक, वैज्ञानिक, तकनीकी, वाणिज्यिक, आदि क्षेत्रों की भाषा संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में पूर्ण रूप से सक्षम हैं। भारत और विश्व में फैले हुए ज्ञान भंडार को भारतीय भाषाओं के माध्यम से विद्यार्थी समुदाय के बीच में लाने की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में माना गया है कि ज्ञान की विविध विधाओं का अध्ययन अपनी भाषा में करने से शिक्षा में उत्कृष्टता आएगी तथा ऐसी युवा पीढ़ी का निर्माण हो सकेगा जो पूर्ण रूप से भारतीय मूल्यों एवं परम्पराओं के प्रति समर्पित होगी। ऐसे समर्थ युवाओं के निर्माण  से निश्चित ही समर्थ, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की संकल्पना साकार हो सकेगी। 

   * डॉ. राकेश मिश्र 

प्रदेश अध्यक्ष, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, 

महाकौशल 



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