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संत जैसे जीवन-वृत्ती बाल आपटे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पथ प्रदर्शक नई पीढ़ी के लिए प्रेरणाश्रोत हैं बाल आपटे

 इस धरती पर कभी-कभी ऐसे व्यक्ति का अवतरण होता है, जिसके व्यक्तित्व से  संगठन, समाज और राष्ट्र को जो प्रकाशपुंज मिलता है, उससे आलोकित होकर पीढ़ी दर पीढ़ी प्रकाशित होती रहती है। 18 जनवरी 1939 को ऐसे ही एक विराट व्यक्तित्व के रूप में विख्यात बलवंत परशुराम आपटे का अवतरण महाराष्ट्र राजगुरू नगर में हुआ। उनके व्यक्तित्व का वर्णन शब्दों या वाक्यों में संभव नहीं है। एक मेधावी छात्र, कुशल प्रशिक्षक और संगठन के शिल्पकार के रूप में सतत स्मरणीय रहेंगे। मुम्बई विधि महाविद्यालय के यशस्वी प्राध्यापक के रूप में वे याद किये जाते हैं। 1948 में जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर प्रतिबंध लगा था, उसी कालखंड में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का जन्म हुआ था। बाल आपटे छात्र जीवन से ही विद्यार्थी परिषद में सक्रिय थे और चार दशक तक इससे जुड़े रहे। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को गढ़ने वाले शिल्पियों में श्री आपटे का नाम बड़े गर्व से लिया जाता है। उन्होंने इस विशाल छात्र संगठन का नेतृत्व किया, मात्र यह कहने से शायद बात पूरी नहीं होती है। 


1960 के दशक में विद्यार्थी परिषद का वैचारिक अभियान शुरू हुआ। उस कालखंड में परिषद की विचारधारा को आगे बढ़ाने का कार्य आपटे जी के मार्गदर्शन में शुरू हुआ। बाल आपटे “ विद्यार्थियों के सह्भागात्मक भूमिका” का प्रारूप प्रस्तुत किया। सील (SEIL) योजना के कार्यान्वयन में भी उनकी प्रमुख भूमिका रही। 1974 में जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का रजत जयंती वर्ष था, उस वर्ष बाल आपटे को परिषद का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। उसके बाद ही विद्यार्थी परिषद ने यह मत रखा कि छात्र शक्ति ही राष्ट्रशक्ति है। यह वही समय था जब गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन शुरू हो चुका था और बिहार में उसकी गूंज सुनाई पड़ने लगी थी। गुजरात और बिहार में आंदोलन में परिषद ने अपनी सहभागिता से यह सिद्ध कर दिया कि देशहित का हर विषय छात्र से जुड़ा होता है। चाहे वह, शैक्षिक हो, सामाजिक हो या राष्ट्रीय हो। 1975 में जब आपातकाल के विरोध में विद्यार्थी परिषद ने भूमिगत आंदोलन शुरू किया तो इसमें बाल आपटे की प्रमुख भूमिका रही। आपातकाल में उनको मीसा के अंतर्गत उनको आर्थर रोड जेल और नासिक रोड जेल में बंद रखा गया। 1977 में चुनाव की घोषणा के बाद उनकी रिहाई हुई। वे दो वर्षों तक जेल में भी सृजनात्मक कार्य में लगे रहे। जेल में रहते हुए उन्होंने अनेक शोधपत्र तैयार किए। आगामी भूमिका के संबंध में विचार-विमर्श किया कि जेल से बाहर निकलने के बाद क्या-क्या किया जा सकता है? आपातकाल के समय मुम्बई के विधि महाविद्यालय से उनकी सेवा समाप्त की जा चुकी थी तो उन्हें व्यावसायिक रूप से वकालत को अपनाना पड़ा था। महाराष्ट्रस के अतिरिक्ती एडवोकेट जनरल रह चुके आपटे जी कानून के सर्वोच्च ज्ञाता भी थे। सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में उनकी तार्किक शैली एवं ईमानदारी की चर्चा आज भी होती है । कई न्यायाधीश भी उनकी प्रशंसा करते हैं। फिर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हिन्दुत्व पर दिए गए निर्णयों का संकलन बहुत ही लोकप्रिय हुआ ।  विधि व्यवसाय में व्यस्तता के बावजूद परिषद से उनका प्रगाढ़ संबंध बना रहा। स्पष्ट विचारों के साथ ओजस्वी वक्ता के साथ ही वे बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। या यूं कहें कि बाल आपटे ने अपने संपूर्ण जीवन में संगठन को जीया। सबसे बड़ी बात यह थी कि कार्यकर्ताओं से जिन गुणों, मूल्यों और आचरण की अपेक्षा थी, उसे उन्होंने पहले अपने व्यक्तिगत जीवन में उतारा। संगठन के प्रत्येक कार्यों में आगे रहकर उन्होंने कार्यकर्ताओं को हमेशा प्रामाणिकता से कार्य करने के लिए प्रेरित किया। इतना ही नहीं संघ के विचार परिवार के विविध संगठनों के लिए उन्होंने कार्यकर्ताओं की लंबी कड़ी तैयार की । विपरीत परिस्थितियों में उनकी अद्भुत निर्णय क्षमता को लोग आज भी भूल नहीं पा रहे हैं ।    


वर्तमान समय में जब सांसद और विधायक बनना राजनीति का लक्ष्य सा बन गया है, ऐसे में आपटे साहब जैसे लोगों के लिए सदन से अधिक संगठन प्रिय था। उन्हें जब भाजपा द्वारा राज्यसभा में भेजे जाने का प्रस्ताव दिया गया तो उन्होंने इसे स्वीकार करने में पर्याप्त समय लिया और अंततः राज्यसभा में जाना अथवा नहीं, यह निर्णय संगठन पर छोड़ दिया। हां कहने में समय लेने वाले आपटे जी ने पुनः राज्यसभा में भेजे जाने का कोई आग्रह नहीं दिखाया। फिर राज्यसभा के सांसद के रूप में भी उन्होंने उदाहरण ही पेश किया। इनमें ही अपवाद के रूप में एक उदाहरण है राज्यसभा सांसद बलवंत परशुराम आपटे का जिनका कार्यकाल  2 अप्रैल को पूरा हुआ। 3 अप्रैल को उनके कुछ इष्ट-मित्रों ने उनके सम्मान में शुभेच्छा कार्यक्रम आयोजित किया। 4 अप्रैल को उन्होंने सरकारी आवास खाली कर अपने सभी देय निपटा कर अपने गृहनगर मुंबई के लिये रवाना हो गये। जबकि कई ऐसे सांसद होते हैं जो लंबे समय तक सरकारी आवास पर कब्जा जमाये बैठे हिते हैं । भाजपा की सर्वोच्च  समिति 12 सदस्यीःय पार्टी संसदीय दल के सदस्य  आपटे जी 2000 से लेकर 2012 तक दो बार राज्य सभा के सदस्यी रहे। राजनीतिक कीचड़ में उन्होंयने सदैव कमलवत जीवन जीया।


महाराष्ट्र से दो सत्रों तक लगातार निर्वाचित होकर राज्यसभा में भाजपा का प्रतिनिधित्व करने वाले श्री आपटे भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के दायित्व का भी निर्वहन किया।  जो लोग आपटे जी को जानते हैं वे यह भी जानते हैं कि उन्हें मूल्यों से डिगा पाना कठिन ही नहीं असंभव भी था। जीवन के उतार-चढ़ाव में उन्होंने हर कठिनाई को अपनी दृढ़ता से पार किया है। उनके जीवन में सरलता  इतनी कि बड़ी से बड़ी गलती को मानवीय भूल मान कर क्षमा करने में पल भर न लगाते थे । कठोर इतने कि सिद्धान्त के विरुद्ध किसी भी बात को मनवा लेना असंभव था। चाहे वह बात कितना भी बड़ा व्यक्ति कह रहा हो।


मूल्यों पर दृढ़ रहते हुए जीना और बिना समझौता किये कीचड़ में कमल की तरह सार्थक जीवन जीने का उदाहरण श्री बलवंत आपटे ने प्रस्तुत किया है। जब सब ओर पतन के आलेख लिखे जा रहे हों, तब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का एक कार्यकर्ता राजनैतिक जीवन में प्रकाश स्तंभ के रूप में खड़ा रहे, यह संगठन के लिये गौरव का विषय है। परिवार, व्यवसाय, निजी जीवन, राजनीति और देशसेवा के बीच बेहतर समन्वय उनके जीवन में देखा गया। 


राष्ट्रीय छात्रशक्ति से श्री आपटे का संबंध दशकों पुराना है। जब-जब भी पत्रिका का प्रकाशन हुआ, आपटे जी का मार्गदर्शन सदैव मिला। प्रारंभिक वर्षों में तो वे ‘दिशा-दर्शन’ नाम से नियमित स्तंभ लिखते रहे। राज्यसभा में आना अथवा कार्यकाल पूरा कर जाना, यह कोई नयी अथवा विशेष बात उनके व्यक्तित्व के लिए नहीं था। उनके व्यक्तित्व की विशेषता तो उनके  कृतित्व में झलकती थी। छात्र संगठन को दिशा देने के बाद राजनीतिक क्षेत्र में उनके जीवन की एक तरह से दूसरी पारी थी। दोनों ही पारियों को उन्होंने सफलता के साथ-साथ सार्थकता से पूरा किया। 


संस्कृत, हिंदी, मराठी एवं अंग्रेजी भाषा के प्रकांड विद्वान बाल आपटे ने समाज सेवा, संगठन के शिल्प के साथ ही साहित्य सृजन के माध्यम से भी समाज, राष्ट्र और आने वाली पीढ़ी को मार्ग दिखा गए। उनके द्वारा रचित नेशन फर्स्ट वर्तमान पीढ़ी के लिए पाथेय है ।  ऐसे महान राष्ट्रोवादी चिंतक 73 वर्ष की आयु में 17 जुलाई 2012 इस संसार को अलविदा कह गए, लेकिन उनका मार्गदर्शन आज भी लोगों को मिल रहा है । चिंतक, विचारक, लेखक एवं संगठक के रूप में बाल आपटे भारतीय राजनीति में एक आदर्श के रूप में स्थापित रहेंगे। आज उनकी जयंती पर उन्हें शत-शत नमन।  

डॉ. राकेश मिश्र, 



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