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आयुर्वेद और एलोपैथी प्रतिद्वंद्वी नहीं सहयोगी बनें कृष्णमोहन झा/

 यह नितांत दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश  जब  कोरोना के भयावह प्रकोप के कारण त्राहि त्राहि कर रहा है तब  योगगुरु बाबा रामदेव और एलौपैथिक चिकित्सकों के बीच जुबानी जंग छिड़ी हुई है । इस अप्रिय जुबानी जंग की शुरुआत बाबा रामदेव ने ही  की  है जिनका विवादों से हमेशा ही चोली दामन का साथ रहा है।बाबा रामदेव यह सिद्ध करने पर तुले हुए हैं कि देश में  जिन लाखों कोरोना  संक्रमित लोगों की प्राण रक्षा संभव नहीं हो सकी है उनमें से अधिकांश का एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति से उपचार किया गया था जबकि जिन कोरोना संक्रमितों ने उपचार के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का सहारा लिया उनमें से प्रायः सभी पूरी तरह स्वस्थ हो चुके हैं। बाबा रामदेव  अपने बयानों से यह भी सिद्ध करना चाहते हैं कि देश में लोगों को कोरोना संक्रमण से बचाने के लिए जो टीके लगाए जा रहे हैं उनकी उपयोगिता भी असंदिग्ध नहीं है क्योंकि टीके लगवाने के बावजूद  एक हजार एलोपैथिक चिकित्सकों की कोरोना संक्रमण से मृत्यु हो चुकी है। बाबाजी के बयानों से यह ध्वनि निकलती है कि लोगों की कोरोना संक्रमण से  रक्षा करने हेतु उनके पतंजलि संस्थान में तैयार की गई दवा  कोरोना के टीकों से कहीं अधिक विश्वसनीय है। बाबा रामदेव के इन बयानों पर  देश के प्रख्यात एलोपैथिक चिकित्सकों और उनके प्रतिनिधि संगठन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने कड़ी आपत्ति जताते हुए उनके विरुद्ध कानूनी लड़ाई की शुरुआत भी कर दी है परंतु बाबा रामदेव अपने बयानों से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं बल्कि अब तो उन्होंने यह चुनौती भी दी है कि कोई ताकत उनको गिरफ्तार नहीं कर सकती। यह चुनौती उन्होंने देश में किस कानूनी एजेंसी को दी है यह तो बाबाजी ने स्पष्ट नहीं किया है परंतु भयावह कोरोना संकट के दौरान  बाबा रामदेव और एलोपैथिक चिकित्सकों के बीच प्रारंभ हुए इस अवांछनीय अप्रिय विवाद में केंद्र सरकार की तटस्थता ने बाबा रामदेव को 'जीत' की मुद्रा में ‌ला दिया है ।  बाबा रामदेव के  हौसले अब इतने  बुलंद हो चुके हैं कि  वे एलोपैथिक चिकित्सकों के साथ अपनी इस लड़ाई में खुद को अजेय मान चुके हैं। बाबा रामदेव के किसी बयान से विवाद की स्थिति निर्मित होने का यह  पहला मौका नहीं है । इसके पहले भी  बाबा रामदेव द्वारा एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति  के बारे में दिए गए बयानों से विवाद खड़े होते रहे  हैं परंतु उनका यह विवादास्पद बयान दर असल ऐसे समय आया है  जब देश के अनेक राज्यों में कोरोना की दूसरी लहर के प्रकोप का शिकार होकर हजारों लोग एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति से ही अपना उपचार करा रहे हैं। बाबा रामदेव को शायद  यह जानकारी भी नहीं है कि विभिन्न राज्यों में  स्थित आयुर्वेद चिकित्सा संस्थानों में कोरोना के गंभीर संक्रमण से ग्रस्त लोगों को भर्ती ही नहीं किया जा रहा है। बाबा रामदेव क्या यह नहीं जानते कि कोरोना  के गंभीर संक्रमण के मरीज एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के जरिए स्वस्थ होकर बड़ी  संख्या में  घर लौट रहे हैं। गौरतलब है कि रामदेव के द्वारा कुछ समय पूर्व दिए गए एक बयान के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा हर्षवर्धन ने उन्हें एक पत्र लिखकर इस तरह के आपत्तिजनक बयान न देने का परामर्श भी दिया था । आश्चर्य की बात यह भी है कि कुछ समय पूर्व   बाबा रामदेव ने पतंजलि संस्थान द्वारा तैयार दवा कोलोनिल को लांच करने हेतु आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा हर्षवर्धन को आमंत्रित किया था जो स्वयं एक प्रसिद्ध एलोपैथिक चिकित्सक रहे हैं।यह बात अलग है कि उक्त समारोह में डा हर्षवर्धन की मौजूदगी पर भी विवाद उत्पन्न हो गया था। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि केंद्र में और विभिन्न राज्यों में स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी आमतौर पर उन्हीं मंत्रियों को सौंपी जाती रही है जिन्होंने अतीत में एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति में उपाधि अर्जित की है। बाबा रामदेव से यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि अगर वे आयुर्वेद को एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति से बेहतर मानते हैं तो उन्होंने कभी यह मांग क्यों नहीं की की केंद्र में और राज्य सरकारों में स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी आयुर्वेद में उपाधि प्राप्त चिकित्सकों को सौंपी जानी चाहिए। केंद्र में आयुष मंत्रालय का गठन अवश्य किया गया है परन्तु केंद्र  सरकार की ओर से आधिकारिक बयान हमेशा डा हर्षवर्धन द्वारा दिए जाते हैं जो एक एलोपैथिक चिकित्सक रहे हैं। निश्चित रूप से यह समय इन सब मुद्दों पर विचार करने का नहीं है परंतु बाबा रामदेव ने इस समय एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के विरुद्ध जिस बहस की शुरुआत की है उस बहस के लिए यह समय कदापि उपयुक्त नहीं है। वर्तमान में तो सर्वोपरि आवश्यकता इस बात की है कि  जिस किसी भी चिकित्सा पद्धति के माध्यम से जानलेवा कोरोनावायरस के संक्रमण से ग्रस्त व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ पहुंचाने में  सफलता मिलती है उसको  न केवल प्राथमिकता प्रदान की जाए बल्कि उस उस चिकित्सा पद्धति के विशेषज्ञों का पूरा सम्मान किया जाए। जिन एलोपैथिक चिकित्सा विशेषज्ञों ने अपनी जान जोखिम में डालकर कोरोना संक्रमितों को स्वास्थ्य लाभ पहुंचाने का अपना फर्ज निभाया है वे निःसंदेह सराहना और सम्मान के हकदार हैं और अगर आयुर्वेद ,योग और नेचुरोपैथी  के माध्यम से कोरोना संक्रमितों की प्राण रक्षा संभव हो सकी है तो बाबा रामदेव भी साधुवाद के हकदार हैं परन्तु यह समय बाबा रामदेव और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के बीच द्वंद्व युद्ध के लिए कतई उपयुक्त नहीं है। बाबा रामदेव यह दावा कर रहे हैं कि देश में केवल 10 प्रतिशत कोरोना संक्रमित एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के माध्यम से स्वस्थ हुए हैं और बाकी 90  प्रतिशत कोरोना संक्रमितों को योग और आयुर्वेद ने स्वस्थ किया है ।इस दावे की जांच के लिए भी यह समय उपयुक्त नहीं है। मैं केवल यह निवेदन करना चाहता हूं कि पहले देश को कोरोना संकट से पूरी तरह मुक्त हो जाने दीजिए फिर देश यह तय कर लेगा कि एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति और योग- आयुर्वेद में से किस पद्धति से स्वस्थ होने वाले लोगों का प्रतिशत अधिक था।यह बहस इस समय बेमानी है। यह अप्रिय, अनावश्यक और असामयिक बहस उन चिकित्सा विशेषज्ञों का ध्यान भंग कर सकती है जो अपनी जान जोखिम डाल कर रात दिन कोरोना संक्रमितों को स्वास्थ्य लाभ पहुंचाने के पुनीत कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के लिए चुनौती पेश कर के स्वयं बाबा रामदेव ने खुद अपना  ध्यान भंग किया है जबकि वे अगर अपने समय और अपनी ऊर्जा का सदुपयोग कोरोना की तीसरी लहर का सामना करने में कारगर आयुर्वेदिक औषधियों के अनुसंधान के लिए करें तो देश को अधिक राहत मिलेगी।बाबा रामदेव और एलोपैथिक चिकित्सा विशेषज्ञों के बीच जारी यह लड़ाई आगे जाकर कब थमेगी या कौन सा रूप लेगी यह कहना अभी मुश्किल है ।जब  बाबा रामदेव अपने बयानों से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं तो इस बात की संभावना तो नहीं के बराबर है वे एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के बारे में दिए गए कथित रूप से आपत्तिजनक बयानों के लिए माफी मांगने की इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की मांग स्वीकार कर लेंगे। उधर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की आपत्ति के बाद बाबा रामदेव ने एसोसिएशन से 25 सवालों के जवाब देने को कहा है  जिसपर अपनी प्रतिक्रिया में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष जे ए जयलाल ने कहा है कि वे इन सवालों के संबंध में  आयुर्वेद के किसी भी डाक्टर से बात करने के लिए तैयार हैं परंतु रामदेव कोई डाक्टर नहीं हैं। डा जयलाल का कहना है कि अगर बाबा रामदेव का पक्ष सही है तो केंद्र सरकार को एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति की मान्यता समाप्त कर देनी चाहिए अन्यथा रामदेव पर आपदा प्रबंधन एक्ट के तहत मामला दर्ज करना चाहिए। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के ही महासचिव डा जयेश लेले ने आरोप लगाया है कि बाबा रामदेव कोरोना वैक्सीन लेने के बाद 10 हजार चिकित्सकों की मौत होने की जो बात कह रहे हैं उसके पीछे उनकी यह मंशा कोरोना वैक्सीन के प्रति लोगों के बीच भय का माहौल निर्मित करने की है। इस तरह वे अपनी दवा को प्रचारित करना चाहते हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने  कहा है कि अब यह प्रमाणित हो चुका है कि कोरोना वैक्सीन  इस वायरस के संक्रमण से मानव शरीर की रक्षा करने में सक्षम है। देश में एलोपैथिक चिकित्सक स्वास्थ्य मंत्रालय,आई सी एम आर और नेशनल टास्क फोर्स की गाइडलाइंस के अनुसार कोरोना संक्रमितों का इलाज कर रहे हैं ऐसे में बाबा रामदेव अपने बयानों से सरकारी आदेशों को चुनौती दे रहे हैं।

                   बाबा रामदेव और एलोपैथिक चिकित्सकों के प्रतिनिधि संगठन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के बीच जारी इस विवाद को थामने के लिए भी तक  केंद्र सरकार की ओर से पहल किए जाने के कोई संकेत नहीं मिले हैं परंतु ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बिना इस विवाद का सुखद पटाक्षेप होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा हर्षवर्धन को इस अप्रिय विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की पहल करनी होगी। अगर दोनों ही पक्ष इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर अपने रुख पर अडिग रहे आते हैं तो यह स्थिति एक जानलेवा वायरस के विरुद्ध हमारी लड़ाई को कमजोर कर सकती है। देश अभी कोरोना की दूसरी लहर के प्रकोप से मुक्त नहीं हुआ है और तीसरी लहर को भी अवश्यंभावी बताया जा रहा है ऐसे में एलोपैथी बनाम आयुर्वेद का के इस अप्रिय विवाद को यहीं विराम देकर तीसरी लहर की तैयारी पर ही सारा ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।यही सारा देश चाहता है।  

(लेखक ifwj के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है)


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