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(31अक्टूबर जयंती पर पुण्य स्मरण) *“एक भारत-श्रेष्ठ भारत निर्माण” से ही देश का विकास संभव

लौहपुरुष पटेल जी भारत की बीसवीं सदी के चाणक्य कहे जाते हैं। जिस प्रकार से आज़ादी के बाद उन्होंने 562 से अधिक देशी रियासतों को भारत संघ में विलीन करने का ऐतिहासिक काम किया था, वह एक साहसिक एवं चमत्कारिक कार्य से कम नहीं था। आज भारत का मानचित्र, जो हम देख रहे हैं, वह सरदार पटेल जी की ही देन है। हमारी सभ्यता व संस्कृति को जिस रूप में ग्रन्थों  में वर्णित किया गया है, वह साक्षात दिख रहा है। 


उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।

वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ।।


इतिहास के वर्तमान मोड़ पर देश की परिस्थितियों में सरदार वल्लभभाई पटेल का स्मरण हो आना महज संयोग नहीं है। भारत माता की एकता व अखंडता को बनाये रखने के लिए एक भारत बनाना होगा। 5 जुलाई 1947 को रियासतों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि विदेशी आक्रमणकारियों के सामने हमारे आपसी झगड़े, आपसी दुश्मनी, बैर का भाव, हमारी हार की बड़ी वजह थी। अब हमें इस गलती को नहीं दोहराना है और न ही हमें दोबारा किसी का गुलाम होना है। देश के भीतर-बाहर की निराशा-हताशा, भ्रष्टाचार के सामने जन-जीवन को लाचार, निरुपाय एवं निस्सहाय पाकर गुजरात से ही उभरे विशाल व्यक्तित्व के मन में सरदार का स्मरण आना स्वाभाविक है। सरदार पटेल की एक लौह-प्रतिमा का भव्य निर्माण, सरदार सरोवर बॉंध पर किया गया, जो संपूर्ण देश के किसानों द्वारा अपने घरों में अनुपयोगी, बचे हुए लौह-खंडों के दान द्वारा निर्मित हुई है। सरदार पटेल स्वयं तो किसान थे ही, साथ ही पूरा जीवन वे किसानों के हितों की लड़ाई लड़ते रहे। यह मूर्ति विश्व की सबसे ऊँची और भव्य मूर्ति बन गई है। जो समूचे विश्व की शांति, एकता, समानता को समर्पित 'एकता की मूर्ति" का गौरव हासिल कर चुकी है। 


सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म गुजरात के आणंद तालुका के करमसद गाँव के एक किसान परिवार में हुआ। इनके पिता श्री झवेरभाई पटेल एक देशभक्त एवं समाज सेवी थे तथा माता लदबा आस्थावान् महिला थीं। वल्लभभाई का जन्म 31 अक्तूबर, 1875 में इनके ननिहाल में, नडियाड में हुआ। आरंभिक शिक्षा समाप्त कर उच्च शिक्षा के लिए वे लंदन गए। बैरिस्टरी करके सन् 1913 में मुंबई पहुँचे। सन् 1916 में वे गांधीजी के संपर्क में आए और उनके नेतृत्व में ही सन् 1917 में चंपारण सत्याग्रह में इतनी तन्मयता, कुशाग्रता, कर्मठता से अपना परिचय दिया, कि गांधीजी उनसे बहुत प्रभावित हुए। इसकी सफलता के उपरांत सन् 1918 में खेड़ा सत्याग्रह में किसानों का नेतृत्व किया। सन् 1927-28 में बारदोली सत्याग्रह में उन्होंने अपना सर्वस्व दाँव पर लगा दिया। जेल-यात्रा और अंग्रेजों की शासकीय ज्यादतियों के सामने न स्वयं झुके, न साथी किसानों को झुकने दिया। अंग्रेज शासकों ने बड़ी निर्दयतापूर्वक किसानों के ऊपर 30 प्रतिशत कर लगा दिया था। इससे किसानों की कमर ही टूट गई। फिर सन् 1930 का ऐतिहासिक असहयोग आंदोलन चला, जो पूरे देश में जन-जन को जाग्रत् करने वाला सिद्ध हुआ। इससे सरदार पटेल की ख्याति और कार्यक्षमता को पूरा देश मानने लगा।


सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी दूरदृष्टि से बिना युद्ध लडे 562 रियासतों को भारत में सम्मिलित करने का अद्भुत एवं अनोखा कार्य किया। बौद्धों के धर्मगुरु दलाईलामा से सोमनाथ के मंदिर के पुनरुद्धार के बाद उसका लोकार्पण करवाकर एक दूरगामी संकेत दिया था। सनातनी हिंदू, बौद्धों को नास्तिक मानते आए हैं, किंतु सरदार पटेल ने गृहमंत्री के नाते दलाई लामा से उक्त लोकार्पण करवाकर अपने बौद्ध भाइयों को-भारत के बाहर फैले भारत को-तिब्बत, चीन, जापान, जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, लंका आदि में रहनेवाले बौद्धों को अपने मूल देश भारत से जोड़ दिया। वे सब भारत की मानसिक आत्मिक संतानें हैं । वे लोग भारत को अपने लिए पूज्य स्थली मानते हैं। जिस भाव-दृष्टि से सरदार पटेल ने गुजरात में स्थित सोमनाथ मंदिर का लोकार्पण दलाई लामाजी को सौंपा, इस एकात्मता भाव से ही सरदार पटेल की विश्व की सर्वोच्च प्रतिमा, एकता की मूर्ति विश्व में बिखरे बौद्धों को हमारे अधिक निकट ला रही है। हम जिस शक्ति को, अपनेपन में भूले हुए हैं, नरेंद्र मोदी जी उसे याद दिलाने, भूल सुधारने का अवसर प्रदान कर रहे हैं। सोचें, तब भारत की जनसंख्या विश्व में कितनी होगी? और शक्ति की क्या सीमा होगी? 

"वह कम बोलते थे, किंतु जो कुछ भी बोलते थे, वह दृढ तथा असंदिग्ध ढंग का होता था। उनकी वाणी राष्ट्र की आवाज होती थी, जिसके संबंध में न तो कोई अशुद्धि कर सकता था और न भ्रांति हो सकती थी। वे कम बोलते थे, किंतु कार्य करने में दृढ थे।" सरदार वल्लभभाई पटेल की वक्तृता लोगों के हित को समक्ष रखकर उनकी अपेक्षाओं के अनुकूल धाराप्रवाही होती थी। "उनकी भाषा श्रोताओं और अवसर के अनुकूल होती थी। वह गाँव के मुहावरे में बोल सकते थे, अगले ही पल वे साहित्यिक गुजराती में अपने वाक्यों को बदल लेते थे । उनके शब्द उनके हथियार थे, जो निशाना कभी नहीं चूकते थे।" 

      सरदार वल्लभभाई के चारित्रिक गुण भी अन्य नेताओं से भिन्न होने से जनता को आकर्षित करने वाले तथा प्रेरक थे। वे किसी भी सामाजिक आपदा के समय सबको साथ लेकर बढ़-चढ़कर सहायता कार्यों को सफलतापूर्वक संपन्न करते, किंतु पुरस्कार प्रदर्शन से सदा दूर रहते। "उन्हें आत्म प्रदर्शन पसंद नहीं था। विज्ञापनबाजी भी उन्हें पसंद नहीं थी, और थी भी तो आवश्यकता भर, बहुत कम। उसमें भी व्यक्तित्व का विज्ञापन तो लेशमात्र भी नहीं। वह गरजने वाले मेघ नहीं, वरन् बरसने वाले धुआँधार मेघ थे। वे ठोस वीरता के पुजारी थे, लल्लो-चप्पो के शब्द उन्हें आकर्षित नहीं कर सकते थे ।" 

        साफ, स्पष्ट सोच उनकी योजनाओं का आधार थी। तब उनके आलोचक उन्हें फासिस्ट तथा 'हिटलर' तक का संबोधन दे देते थे। जिससे उन्हें आत्मपीड़ा तो होती, किंतु इससे उनके पाँव उस ओर से विरत न होते। वे जानते थे कि उन कुछ लोगों की ओर से ये विशेषण दिए जा रहे हैं, जिनके स्वार्थ पूरे नहीं हो पा रहे है, किंतु देश में व्यापक रूप से सरदार की ख्याति सदा बढ़ती रहती।

     आज आजादी के इतने वर्षों से देश में जो व्यवस्थायें चल रहीं थीं , कश्मीर में धारा 370 को हटाकर वहाँ कश्मीर, लद्दाख को दो अलग केन्द्रशासित प्रदेश बनाना, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र  मोदी जी की दृढ़इच्छा शक्ति ही दर्शाती है। भारत के आजाद होने पर देश एक बने, यह सरदार पटेल की दृढ़ शक्ति से हुआ था। आज देश को ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ बनाने में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र् मोदी व देश के गृहमंत्री श्री अमित शाह प्राणपण से जुटे हुये हैं। जहाँ बीसवीं सदी का चाणक्य सरदार पटेल को कहा जाता है, तो वहीं इक्कीसवीं सदी का चाणक्य श्री अमित शाह को संबोधित किया जाने लगा है। भारत भूमि का कण-कण व क्षण-क्षण यहाँ के नागरिकों को मिले यह उदात्त चरित्र भावना हमारे प्रधानमंत्री जी की है। सरदार पटेल ने लौहपुरुष के रुप में अपने सामर्थ्यों का जो परिचय दिलाया, वह भौगौलिक रूप से पूर्ण हो गया था। एकता का यह मंत्र निरंतर हमारे चिंतन का, व्यवहार का, अभिव्यक्ति का माध्यम होना चाहिए। भारत विविधताओं से परिपूर्ण है। अनेक पंथ, संप्रदाय, बोलियाँ, जातियाँ, परिवेश, खान-पान में देश विविधताओं से भरा हुआ है। यह विविधताओं के कारण ही हमारे देश की शोभा दुनिया में उसे अलग बनाती है। यह विविधता न होती तो शायद जिस शोभा के लिए हम गर्व करते हैं, वो नहीं कर पाते। इसलिये विविधता ही एकता का मंत्र है और आज की सरकार ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के भाव को चरितार्थ कर रही है।

ऐसे महामानव लौहपुरुष को विनम्र श्रद्धांजलि!


  डॉ. राकेश मिश्र

 कार्यकारी सचिव, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी




 

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