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भारतीय राजनीति के संधिपुरुष : अटल बिहारी वाजपेयी"

 अटल बिहारी वाजपेयी एक व्यक्ति का नाम नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी का नाम कान में पड़ते ही हर भारतीय के हृदय में एक सुखद और स्मरणीय स्पंदन उत्पन्न होता है, आदर का भाव उभरता है, राष्ट्रभक्ति का अनुराग जगता है, राष्ट्रभाषा के प्रति प्रेम उमडता है, साहित्य की संवेदना जगती है, राजनीति में अजातशत्रु की तस्वीर उभरती है। साथ ही निजी जीवन में प्राप्त सफलता, जिनके राजनीतिक कौशल को दर्शाता है। भारतीय राजनीति में पिछले कई दशकों में वह एक ऐसे राजनेता के रूप में प्रतिष्ठित हुए, जो विश्व के प्रति उदारवादी सोच, लोकतांत्रिक आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता और राष्ट्र के समर्पण को महत्व देते रहे हैं। बात चाहे महिलाओं के सशक्तिकरण की हो अथवा सामाजिक समानता की। विश्व बन्धुत्व के समर्थक श्रद्धेय वाजपेयी जी भारत को सभी राष्ट्रों के बीच एक दूरदर्शी, विकसित, मजबूत और समृद्ध राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ते हुए देखना चाहते थे। वह ऐसे भारत का प्रतिनिधित्व करते थे, जिस देश की सभ्यता का इतिहास पांच हजार साल पुराना है और जो अगले हज़ार वर्षों में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, अटल जी के सपने का भारत बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। आज विश्व पटल पर भारत जिस बुलंदी पर है, उसका सपना अटल जी ने देखा था, श्री मोदी जी और 

श्री अमित शाह जी उसे साकार कर रहे हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के एक शिखर पुरुष के रूप में स्थापित राजनेता के साथ ही  एक संधि पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित होकर सदा-सर्वदा स्मरणीय रहेंगे। परतंत्र भारत को स्वतन्त्र होते देखने वाले अटल बिहारी वाजपेयी परतंत्र और स्वतंत्र भारत के संधि काल के साक्षी रहे हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश को एक राजनीतिक विकल्प देने के लिए जब जनसंघ का निर्माण हो रहा था तो वह भारतीय राजनीति का एक संधिकाल था और श्रद्धेय वाजपेयी जी जनसंघ के संस्थापकों में शामिल थे। फिर ढाई दशक बाद लोकतंत्र की रक्षा के लिए जब जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हुआ, उस समय अटल जी जनसंघ के शीर्ष नेतृत्व में थे। फिर, अपनी राष्ट्रवादी विचारधारा की रक्षा के लिये जनता पार्टी से अलग होना पड़ा, तो भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक स्वरूप सामने आया तो प्रथम अध्यक्ष के रूप में अटल जी का कुशल नेतृत्व पार्टी को मिला।

राजनीति के अलावा सत्ता की भी बात हो तो जब दो सदियों का मिलन हो रहा था, अर्थात् बीसवीं सदी जा रही थी और इक्कीसवीं सदी आयी तो देश का नेतृत्व अटल बिहारी वाजपेयी के ही हाथों में था।

❖ एकता के प्रतीक थे वाजपेयी जी :

विविधता में एकता का देश कहलाने वाले भारत में अटल जी एकता के सूत्रधार बने रहे। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और नई दिल्ली से सांसद बनकर यह बताया कि उनका व्यक्तित्व और राजनीति अखिल भारतीय स्वरूप को मजबूत करने के लिए है। पूर्व प्रधानमंत्री और 'भारत रत्न' अटल बिहारी वाजपेयी जी देश के एकमात्र ऐसे राजनेता थे, जो चार राज्यों के छह लोकसभा क्षेत्रों की नुमाइंदगी कर चुके थे। उत्तर प्रदेश के लखनऊ और बलरामपुर, गुजरात के गांधी नगर, मध्य प्रदेश के ग्वालियर और विदिशा तथा दिल्ली की नई दिल्ली संसदीय सीट से चुनाव जीतने वाले वाजपेयी इकलौते नेता हैं।

❖ राष्ट्र के लिए समर्पित जीवन :

25 दिसंबर 1924 को अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्म हुआ था। इस दिन को बड़ा दिन कहा जाता है तो इस तिथि को भी अटल जी के विराट व्यक्तित्व ने बड़ा बना दिया। उन्हें भारत के प्रति उनके नि:स्वार्थ समर्पण और छह दशक तक देश और समाज की सेवा करने के लिए भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया गया। इससे पहले पद्म विभूषण भी दिया गया। 1994 में उन्हें भारत का 

‘सर्वश्रेष्ठ सांसद’ चुना गया। अपने नाम के ही समान, अटल जी एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय नेता, प्रखर राजनीतिज्ञ, नि:स्वार्थ सामाजिक कार्यकर्ता, प्रखर वक्ता, कवि, साहित्यकार, पत्रकार और बहुआयामी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति थे। अटल जी जनता की बातों को ध्यान से सुनते रहे और उनकी आकाँक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करते रहे। उनके द्वारा किये गये कार्य राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण को दिखाता है। वाजपेयी जी के असाधारण व्‍यक्तित्‍व को देखकर पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि आने वाले दिनों में यह व्यक्ति जरूर प्रधानमंत्री बनेगा।

❖ हिंदी के रहे हिमायती :

अटल जी राष्ट्रभाषा हिंदी के विकास के लिए भी समर्पित रहे। साहित्यकार के रूप में अपनी कालजयी रचनाओं से हिंदी साहित्य के भंडार को भरा तो सरकार में शामिल होने का जब अवसर मिला, तो उसे संवैधानिक स्तर पर सम्मान दिलाते हुए विश्व पटल पर हिंदी को स्थापित किया। अटल जी, मोरार जी भाई देसाई के नेतृत्‍व वाली सरकार में विदेश मामलों के मंत्री बने। विदेश मंत्री बनने के बाद वाजपेयी पहले ऐसे नेता थे, जिन्‍होंने संयुक्‍त राष्‍ट्र महासंघ को हिन्‍दी भाषा में ही संबोधित किया। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी एवं गृहमंत्री श्री अमित शाह जी ने भी हिंदी को दुनिया में स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोडी है।

❖ गठबंधन की राजनीति के महानायक :

भारत में एक ओर गठबंधन की राजनीति अपरिहार्य होती जा रही थी तो दूसरी ओर इसकी विफलता देश को अस्थिरता की ओर ले जा रही थी। लेकिन, वाजपेयी जी ने दो दर्जन दलों के साथ गठबंधन की सरकार को स्थिरता के साथ पूरे कार्यकाल तक केवल चलाया भर नहीं अपितु देश और दुनिया को उनकी कुशलता के साथ ही गठबंधन की राजनीति भी समझ में आयी। राजनीति के बारे में उनके विचार आदर्श राजनीति का सूत्रवाक्य हैं। विभिन्न मौकों पर उन्होंने जो कुछ कहा, वह भारतीय राजनीति के लिए आदर्श है।

बतौर राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी हर मुमकिन ऊंचाई तक पहुंचे। वे प्रधानमंत्री के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा करने वाले पहले ग़ैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे। दो सीटों वाली पार्टी, भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनाने की उपलब्धि केवल अटल बिहारी वाजपेयी की भारतीय राजनीति में सहज स्वीकार्यता के बूते की बात थी। वाजपेयी जी तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे, पहले 13 दिन तक, फिर 13 महीने तक और उसके बाद 1999 से 2004 तक का कार्यकाल उन्होंने पूरा किया। इस दौरान उन्होंने यह साबित किया कि देश में गठबंधन सरकारों को भी सफलता से चलाया जा सकता है। ज़ाहिर है कि जब वाजपेयी स्थिर सरकार के मुखिया बने तो उन्होंने ऐसे कई बड़े फ़ैसले लिए जिसने भारत की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उन फ़ैसलों को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा जो राष्ट्रनिर्माण में लंबे समय तक भारतीय राजनीति में नज़र आता रहेगा : -

1. प्रधानमंत्री के तौर पर वाजपेयी के जिस काम को सबसे ज़्यादा अहम माना जा सकता है वो सड़कों के माध्यम से भारत को जोड़ने की योजना है। उन्होंने चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली और मुंबई को जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना लागू की। साथ ही ग्रामीण अंचलों के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना लागू की। उनके इस फ़ैसले ने देश के आर्थिक विकास को रफ़्तार दी। उनकी सरकार के दौरान ही भारतीय स्तर पर नदियों को जोड़ने की योजना का ख़ाका भी बना।

2. भारत में संचार क्रांति का जनक जिसे भी कहा जाता हो, लेकिन उसे आम लोगों तक पहुंचाने का काम वाजपेयी सरकार ने ही किया था। 1999 में वाजपेयी ने भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) के एकाधिकार को ख़त्म करते हुए नई टेलिकॉम नीति लागू की।

3. सर्व-शिक्षा अभियान के तहत छह से 14 साल के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा देने का अभियान वाजपेयी जी के कार्यकाल में ही शुरू किया गया था। 2000-2001 में उन्होंने ये स्कीम लागू की। जिसके चलते बीच में पढ़ाई छोड़ देने वाले बच्चों की संख्या में कमी दर्ज की गई। 2000 में जहां 40 फ़ीसदी बच्चे ड्रॉप आउट्स होते थे, उनकी संख्या 2005 आते-आते 10 फ़ीसदी के आसपास आ गई थी। इस मिशन से वाजपेयी के लगाव का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने स्कीम को प्रमोट करने वाली थीम लाइन 'स्कूल चलें हम' ख़ुद से लिखा था।

4. मई 1998 में भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था। ये 1974 के बाद भारत का पहला परमाणु परीक्षण था। वाजपेयी ने परीक्षण यह दिखाने के लिए किय़ा था कि भारत परमाणु संपन्न देश है। इस परीक्षण के बाद अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा और कई पश्चिमी देशों ने आर्थिक पांबदी लगा दी थी, लेकिन वाजपेयी जी कूटनीति कौशल का कमाल था कि 2001 के आते-आते ज़्यादातर देशों ने सारी पाबंदियां हटा ली थीं।

 

ऐसे महामानव को संधिपुरुष के रूप में विनम्र श्रद्धांजलि!

 

* डॉ. राकेश मिश्र*

कार्यकारी सचिव, पूर्व राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष, भारतीय जनता पार्टी

 



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